सुपौल। राघोपुर प्रखंड क्षेत्र के फिंगलास पंचायत में कृष्णकांत झा उर्फ लाल झा के आवासीय परिसर में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का समापन रविवार को भक्ति और भावनाओं के बीच संपन्न हो गया। कथा के सातवें एवं अंतिम दिन कथावाचक आचार्य रणधीर झा ने सुदामा चरित्र का भावपूर्ण एवं गहन व्याख्यान प्रस्तुत किया, जिसे सुनकर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे।
आचार्य ने अपने प्रवचन में बताया कि श्रीमद्भागवत के अनुसार भगवान की कृपा प्राप्त करना कठिन नहीं है, बल्कि सच्चे भाव और निष्कपट भक्ति से यह सहज ही मिल जाती है। सुदामा और भगवान श्रीकृष्ण की मित्रता का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि भगवान अपने सच्चे भक्तों पर बिना मांगे ही कृपा बरसाते हैं। “बिन मांगे मोती मिले, मांगे मिले न भीख” कहावत इसी सत्य को दर्शाती है।
उन्होंने आगे कहा कि भगवान श्रीकृष्ण द्वारा दिए गए ब्रह्मज्ञान के उपदेश से यह स्पष्ट होता है कि सनातन धर्म को समझने के लिए ब्रह्मज्ञान अत्यंत आवश्यक है। इसके बिना जीवन के गूढ़ रहस्यों को समझना संभव नहीं है। कथा के दौरान कालयवन और रक्तबीज जैसे प्रसंगों का उल्लेख करते हुए आचार्य ने वर्तमान समय में दुष्प्रवृत्तियों से सतर्क रहने की आवश्यकता पर बल दिया।
भस्मासुर और भगवान शिव के प्रसंग के माध्यम से उन्होंने अहंकार के दुष्परिणामों को समझाया। वहीं अवधूतोपाख्यान के संदर्भ में उन्होंने बताया कि हमें पृथ्वी से धैर्य, अग्नि से तेज, वृक्ष से परोपकार और मधुमक्खी से संग्रह न करने की शिक्षा लेनी चाहिए।
कथा में यादवों के विनाश, ब्रह्मशाप और प्रभास क्षेत्र के प्रसंगों के माध्यम से जीवन की अनित्यता और अहंकार के परिणामों पर भी प्रकाश डाला गया। साथ ही बद्ध, मुक्त और भक्तों के लक्षणों का विस्तार से वर्णन करते हुए आचार्य ने सत्संग की महिमा को बताया और कहा कि सत्संग से ही मनुष्य का जीवन पवित्र एवं सार्थक बनता है।
भगवान श्रीकृष्ण के स्वधाम गमन के प्रसंग के दौरान वातावरण अत्यंत भावुक हो गया। आचार्य रणधीर झा द्वारा प्रस्तुत श्रीकृष्ण विदाई गीत को सुनकर श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं।
कथा के अंत में कलियुग के राजवंशों तथा राजा परीक्षित की परमगति का वर्णन किया गया। कार्यक्रम के सफल आयोजन में पूरे गांव के लोगों का सराहनीय योगदान रहा।

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