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अपील के बाद कुलसचिव ने दिखाई संवेदनशीलता,पूर्व छात्र की डेढ़ माह पुरानी समस्या का किया त्वरित निस्तारण

मधेपुरा (राज टाइम्स)।  बिहार अभियंत्रण विश्वविद्यालय (बीईयू) में एक पूर्व छात्र की लंबित समस्या का समाधान न केवल एक व्यक्तिगत सफलता है, बल्कि यह पूरे तकनीकी शिक्षा तंत्र के लिए एक प्रेरणादायक संदेश बन गया है कि सुनने वाला अगर सही जगह हो, तो समस्या का समाधान दूर नहीं!

विभांषु कुमार

  बी.पी. मंडल इंजीनियरिंग कॉलेज, मधेपुरा के पूर्व छात्र विभांषु कुमार को प्रतियोगी परीक्षा में शामिल होने के लिए कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज चाहिए थे, जो उन्हें महाविद्यालय से ही मिलने थे। शुरू में महाविद्यालय ने कहा कि विश्वविद्यालय से लें। फिर हेल्पलाइन, क्लर्क, सहायक कुलसचिव, उप परीक्षा नियंत्रक प्रत्येक स्तर पर आश्वासन मिला, लेकिन 1.5 महीने बीत गए पर काम नहीं हुआ। विभांषु ने कहा कि शिक्षा के मंदिर में झूठ बोलना, वादा तोड़ना और जिम्मेदारी टालना कतई शोभनीय नहीं। हम यहां पढ़कर आए हैं, सपने लेकर आए हैं, क्या हमारी मेहनत का यही इनाम है? सभी पदाधिकारी ऐसे नहीं हैं, लेकिन कुछ लोग ऐसे हैं जो सुनते ही नहीं, कॉल नहीं उठाते। यह दुखद है।


लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। जब विभांषु ने विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. प्रदीप कुमार (सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी) से संपर्क किया, तो सब बदल गया। डॉ. प्रदीप कुमार ने न केवल पूरी समस्या को विनम्रता से सुना, बल्कि तुरंत निर्देश दिया और खुद फोन करके सूचित किया कि आपका कार्य हो गया है, बाबू! यह सुनकर विभांषु ने भावुक होकर कुलसचिव का दिल से धन्यवाद देते हुए कहा कि वह भी उनके (कुलसचिव डॉ कुमार) जैसा ईमानदार, संवेदनशील और जिम्मेदार अधिकारी बनना चाहता है। कुलसचिव डॉ. प्रदीप कुमार ने मुस्कुराकर कहा "जरूर बनोगे" 

    विभांषु ने अन्य छात्रों के नाम संदेश देते हुए कहा कि आप हार मत मानो। कॉलेज हो या विश्वविद्यालय, पहले स्तर पर काम ना हो तो अगले स्तर पर जाओ, फिर उच्च अधिकारी तक पहुंचो। प्रयास जारी रखो, कोई न कोई जरूर सुनेगा। अगर डेढ़ माह इंतजार के बाद कुलसचिव महोदय तक पहुंचकर काम करवा सका, तो आप क्यों नहीं? शुरू में ही उच्च स्तर पर बात की होती तो इतना समय नहीं लगता। लेकिन सीख मिली कि सुनने वाला मौजूद है, बस पहुंचना जरूरी है। 

यह घटना बिहार के सभी विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के कर्मचारियों, क्लर्कों, अधिकारियों के लिए एक सकारात्मक उदाहरण है। एक छोटी सी संवेदनशीलता, एक फोन कॉल और त्वरित कार्रवाई से छात्र का भविष्य बच सकता है, उसका विश्वास कायम रह सकता है। हमारा मानना है कि डॉ. प्रदीप कुमार जैसे अधिकारी ही शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाते हैं।






 

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