सुपौल। त्रिवेणीगंज प्रखंड मुख्यालय के लालपट्टी स्थित आइसा कार्यालय में यूजीसी रेगुलेशन समता कमिटी के सदस्यों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन 2026 को लागू करने की मांग की। इस दौरान नेताओं ने उच्च शिक्षण संस्थानों में बढ़ते जाति आधारित भेदभाव पर चिंता जताई।
प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए आइसा के जिला सचिव डॉ. अमित कुमार चौधरी ने कहा कि भारत में सदियों से जाति के नाम पर पिछड़े, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक वर्गों का शोषण होता आया है। उन्होंने आरोप लगाया कि समाज के इन तबकों को उच्च शिक्षा से वंचित रखने की साजिश लगातार की जा रही है। उन्होंने कहा कि यूजीसी की हालिया रिपोर्ट में उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव के मामलों में 118 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई है, जिसमें दलित और पिछड़े वर्ग के छात्र अधिक प्रभावित बताए गए हैं।
उन्होंने कहा कि संविधान में निहित समता, समानता, बंधुत्व, स्वतंत्रता और न्याय की भावना को कुछ लोग चोट पहुंचा रहे हैं और देश में जाति आधारित भेदभाव को खत्म करने के बजाय बढ़ावा दिया जा रहा है। इसी मुद्दे को लेकर 18 मार्च को पूरे बिहार से वंचित तबके के छात्र राजभवन का घेराव करेंगे।
वहीं द सोशलिस्ट के कोशी प्रभारी प्रियदर्शी मंडल ने कहा कि बिहार में जाति आधारित गणना के बाद पिछड़ा, अतिपिछड़ा और दलित वर्गों को 65 प्रतिशत आरक्षण देने का निर्णय लिया गया था, लेकिन पटना हाईकोर्ट द्वारा इस पर रोक लगा दी गई है। उन्होंने मांग की कि सरकार इसे संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल कर जल्द लागू करे।
आइसा के जिला अध्यक्ष संतोष कुमार सियोटा ने कहा कि हाल के दिनों में उच्च शिक्षण संस्थानों में संस्थागत हत्याओं के मामले बढ़े हैं। उन्होंने कहा कि रोहित वेमुला, पायल तड़वी, एंजेल चकमा और दर्शन सोलंकी जैसे कई छात्रों की मौत जाति आधारित भेदभाव के कारण हुई है। उन्होंने आरोप लगाया कि यूजीसी द्वारा नया रेगुलेशन लाकर ऐसे मामलों को कम करने का प्रयास किया गया था, लेकिन कुछ लोगों के दबाव में इस पर रोक लगा दी गई।
वहीं अतिपिछड़ा नेता साजन कुमार मुखिया ने कहा कि ईडब्ल्यूएस आरक्षण संविधान की मूल भावना के खिलाफ है और इससे एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग के आरक्षण का प्रभाव कम हुआ है। उन्होंने मांग की कि ईडब्ल्यूएस आरक्षण को समाप्त कर आबादी के अनुपात में आरक्षण लागू किया जाए।

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